भिक्षावृत्ति उन्मूलन व पुनर्वास की जरूरत

हमारा संविधान देश के सभी नागरिकों को जीने की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। जीने के लिये रोटी, कपड़ा और मकान के साथ ही रोजगार जरूरी है, जिसे उपलब्ध कराने में सरकारें विफल रही हैं। सामाजिक-आर्थिक विषमता और शिक्षा के अभाव का नतीजा यह हुआ है कि आज शारीरिक अक्षमता से ग्रसित लोगों के अलावा बड़ी संख्या में स्वस्थ व्यक्ति, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं, भिक्षावृत्ति के जरिये जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं। इस स्थिति को बदलना होगा।
नि:संदेह, कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से भीख नहीं मांगता लेकिन परिस्थितियां ऐसी हो चुकी हैं, जिसमें आज धार्मिक और पर्यटन स्थलों के बाहर तथा शहर के प्रमुख चौराहों या व्यस्त मार्गों पर बच्चे तक भीख मांगते नजर आते हैं। इनकी परेशानियों से बेखबर हमारा अभिजात्य और कुलीन वर्ग चाहता है कि देश में भिक्षावृत्ति पर प्रतिबंध लगाया जाए और ऐसा करने वालों को दंडित किया जाए।
लेकिन, उच्चतम न्यायालय का स्पष्ट मत है कि भीख मांगना एक सामाजिक-आर्थिक मसला है और न्यायपालिका इस पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती। न्यायालय महसूस करता है कि रोजगार और शिक्षा के अभाव में संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीने के अधिकार के तहत कुछ लोग अपनी कतिपय बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिये आज भीख मांगने को मजबूर है। वैसे देश के कई हिस्सों में भिक्षावृत्ति कराने वालों के संगठित गिरोहों के बारे में भी खबरें मिलती रहती हैं। पुलिस अक्सर ऐसे गिरोह का भंडाफोड़ भी करती है। ये गिरोह बच्चों को अगवा करके उनसे भीख मंगवाते हैं। ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की आवश्यकता है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने अगस्त, 2018 में भिक्षावृत्ति को बंबई भिक्षावृत्ति निवारण कानून के अंतर्गत अपराध के दायरे से बाहर करते हुए जबरन भिक्षावृत्ति कराने वाले व्यक्तियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने संबंधी कानूनी प्रावधान को बरकरार रखा था। न्यायालय ने कहा था कि लोगों, विशेषकर बच्चों को, भीख मांगने के लिये बाध्य करने वाले तत्वों के खिलाफ पुलिस और प्रशासन को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। दिल्ली में बंबई भिक्षावृत्ति निवारण कानून लागू है।
इस समय कई राज्यों में भिक्षावृत्ति निवारण कानून हैं। इनमें पंजाब भिक्षावृत्ति निवारण कानून, हरियाणा भिक्षावृत्ति निवारण कानून, बिहार भिक्षावृत्ति निवारण कानून, मध्य प्रदेश भिक्षावृत्ति निवारण कानून, गुजरात भिक्षावृत्ति निवारण कानून और बंबई भिक्षावृत्ति निवारण कानून शामिल हैं। इन कानूनों में भिक्षावृत्ति दंडनीय अपराध है।
भिक्षावृत्ति को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की उच्च न्यायालय की व्यवस्था के बाद ही उच्चतम न्यायालय में विभिन्न राज्यों में इस तरह के कानून को निरस्त करने के लिये जनहित याचिकाएं दायर की गयीं। इन याचिकाओं पर न्यायालय ने केन्द्र और संबंधित राज्य सरकारों से जवाब भी मांगा था। लेकिन इसी बीच, कोरोना काल में भीख मांगने वाले वर्ग के टीकाकरण और उनके पुनर्वास का मसला न्यायालय में आ गया। इस मामले में भी भीख मांगने पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया, जिसे न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया और याचिकाकर्ता से कहा कि वह इस आग्रह को याचिका से हटायें।
न्यायमूर्ति धनंजय वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एम.आर. शाह की पीठ का मत था कि भीख मांगना एक सामाजिक-आर्थिक समस्या है और इसका समाधान भीख मांगने के लिये मजबूर व्यक्तियों का सरकार द्वारा पुनर्वास और उनके लिए रोजगार के अवसरों का सृजन करना है। इसमें कुछ गैर-सरकारी संगठन भी भूमिका निभा सकते हैं। हो यह रहा है कि राजनीतिक दल चुनावों के दौरान इस तरह के वादे तो करते हैं, परंतु सत्ता में आने के बाद इन्हें भूल जाते हैं।
समाज के इस उपेक्षित वर्ग की भोजन और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं को पूरा करने के मामले में समय-समय पर न्यायपालिका हस्तक्षेप करती रहती है। इसी का नतीजा है कि दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में इन भिखारियों और बेसहारा लोगों के लिए रैन बसेरों का निर्माण किया गया। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में करीब 18 लाख लोग बेघर और बेसहारा थे। निश्चित ही दस साल में इनकी संख्या में काफी वृद्धि हो गयी होगी। इसी तरह, 2011 की जनगणना के अनुसार देश में भीख मांग कर जीवनयापन करने वालों की संख्या 4,13,670 थी, जिसमें अब काफी इजाफा हो गया होगा।
केन्द्र सरकार ने 2013 में एक लाख से अधिक आबादी वाले 790 शहरों के लिए राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के तहत शहरी गरीब बेघरों के लिये स्थाई आश्रयों के निर्माण की योजना शुरू की थी। इसके बावजूद बेघरों और भिखारियों को सड़कों, रेलवे प्लेटफार्म और फ्लाईओवर के नीचे रात गुजारते देखा जा सकता है। लोकसभा में 2018 में भिक्षावृत्ति उन्मूलन और पुनर्वास विधेयक भी पेश किया गया लेकिन यह मामला आगे नहीं बढ़ सका। केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को भिक्षावृत्ति उन्मूलन के लिये समाज के इस वर्ग के पुनर्वास के कार्यक्रम पर सख्ती से अमल करना चाहिए। साथ ही, बच्चों से भिक्षावृत्ति पर अंकुश लगाने के लिये सरकार को मानव तस्करी से संबंधित कानूनों पर सख्ती से अमल सुनिश्चित करना चाहिए।

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