श्मशान घाटों पर बिना देर हो रहा अंतिम संस्कार

लखनऊ

श्मशान घाटों से उठ रहा काला धुआं अब दिखना बंद हो गया है। बाहर सड़क पर गाड़ियों की संख्या भी काफी कम हो गई है। परिजनों को अपने प्रिय के पार्थिव शरीर का दाह संस्कार लकड़ी या विद्युत शवदाह गृह से करने का विकल्प दिया जा रहा है। अफरातफरी का माहौल अब समाप्त हो चुका है। कर्मचारी भी राहत महसूस कर रहे हैं।
अप्रैल माह राजधानीवासियों के लिए काफी भारी रहा। कोरोना ने जमकर तांडव किया। मरने वालों की संख्या की गिनती न हो सकी। लखनऊ के वे श्मशान घाट और कब्रिस्तान जहां माह में कभी-कभार ही शव आते थे वहां भी हर दिन 15-20 शवों का अंतिम संस्कार होने लगा था। जलाने के लिए लकड़ियां और कब्र खोदने के लिए मजदूर कम पड़ गए। इस भयावह स्थिति की शुरुआत चार अप्रैल से हुई जो आठ अप्रैल तक अफरा-तफरी में बदल गई। बैकुंठ धाम और गुलाल घाट पर कोविड प्रोटोकाल को तोड़ते हुए कोविड शवों का दाह संस्कार विद्युत शवदाहगृह के साथ लकड़ी से भी कराने का फैसला हुआ। अलग प्लेटफार्म बने। चिताएं पहले से तैयार की जाने लगी। इसके बाद भी लोगों को इंतजार करना पड़ रहा था।
सिर्फ बैकुंठ धाम और गुलाला घाट पर अंतिम संस्कार की संख्या 300 के आसपास पहुंच गई थी। इसमें कोविड व नान कोविड दोनों शामिल थे। लेकिन आधे से ज्यादा कोविड शव थे। दोनों घाटों पर 27 अप्रैल को सबसे ज्यादा कोविड शव जलाए गए। उस दिन कुल 165 कोविड शवों का अंतिम संस्कार किया गया। इसमें 117 शव बैकुंठ धाम व 43 शव गुलाला घाट पर जलाए गए। इसके बाद शवों की संख्या में गिरावट आनी शुरू हुई। पिछले तीन दिनों से यह संख्या 50 के नीचे पहुंच गई है। बुधवार को दोनों घाटों पर कुल 42 कोविड शवों का अंतिम संस्कार हुआ।

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