मानवता के पुनरुत्थानवादी विचारक रामस्वरूप वर्मा जी
इस धारा में जिसका भी जन्म हुआ है ,उनमें मरणशीलल तो सभी हैं ,परंतु स्मरणशील होने का श्रेय किसी -किसी को ही मिल पाता है। कुछ राष्ट्र नायक के यादों को कब्रगाह में उनके साथ उनके योगदान , स्मरण और विचारों को भी दफना दिया जाता है। परंतु उनके विचार आने वाले सभ्यता और संस्कृति में कितनी प्रगति कर सकते हैं। इसका अवलोकन तभी किया जा सकता है जब उनके विचारों का अध्ययन किया जाए । इसी श्रेणी में आने वाले प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ,समाजशास्त्री ,राजनीशशास्त्री -तर्क व मानवता में विश्वास रखने वाले भारतीय राजनीति के कबीर समाजवादी विचारक आदरणीय रामस्वरूप वर्मा जी थे। आपका जन्म 22 अगस्त 1923 को उत्तर प्रदेश के कानपुर के गौरीकरन नामक गांव में एक किसान परिवार में हुआ। चारों ओर विषम परिस्थितियां होने के पश्चात भी आपने , अपने व्यक्तित्व को इस प्रकार निखारा, जिसमें तर्क के अद्भुत क्षमताएं थी और विचारों में मौलिकता थी। बहुत कम लोग जानते हैं ,क्योंकि यह पाठ्यक्रम का भाग नहीं है । आप पहले भारतीय राजनीतिक विचारक थे जिन्होंने चतुर्दिकी क्रांति को विकसित समाज के लिए आवश्यक आधार बताया। जिसका अभिप्राय था की क्रांति का क्षेत्र केवल एक विषय विशेष एवं क्षेत्रीय विशेष नहीं होना चाहिए। इसमें सामाजिक -आर्थिक ,सामाजिक – राजनीतिक न्याय तो होना ही चाहिए ,इसके साथ -साथ सांस्कृतिक क्रांति भी समतामूलक समाज के लिए अपरिहार्य है। जिस समय विश्व के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री यह साबित कर चुके थे , बजट घाटे में पेश किया जाता है ,अन्यथा संतुलन आधार पर। उस समय आपने, अपनी सूझबूझ और कुशल भारतीय समाज के कारण बजट को ना सिर्फ संतुलित आधार पर पेश किया। जबकि उस समय 20 करोड़ से अधिक फायदे वाला बजट पेश किया। आपने सर्वप्रथम वे 1957 में सोशलिस्ट पार्टी से भोगनीपुर विधानसभा क्षेत्र उत्तर प्रदेश विधान सभा के सद्स्य चुने गये, उस समय आपकी उम्र मात्र 34 वर्ष की थी। 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पर्टी से, 1969 में निर्दलीय, 1980, 1989 में शोषित समाजदल से उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य चुने गये। 1991 में छठी बार शोषित समाजदल से विधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए। जनान्दोलनों में भाग लेते हुए वर्मा जी 1955, 1957, 1958, 1960, 1964, 1969, और 1976 में 188 आई0पी0सी0 की धारा 3 स्पेशल एक्ट धारा 144 डी0 आई0 आर0 आदि के अन्तर्गत जिला जेल कानपुर, बांदा, उन्नाव, लखनऊ तथा तिहाड़ जेल दिल्ली में राजनैतिक बन्दी के रूप में सजाएं भोगीं। वर्मा जी ने 1967-68 में उत्तर प्रदेश की संविद सरकार में वित्तमंत्री के रूप में 20 करोड़ के लाभ का बजट पेश कर पूरे आर्थिक जगत को अचम्भे में डाल दिया। जब दुनिया के प्रसिद्ध पत्रकारों ने इस पर परिचर्चा करना चाहा। उस समय आपका बहुत ही सहज और सरल उत्तर था कि मैंने अपने अर्थव्यवस्था की प्रगति का सूचक और आधार कृषि और किसान को माना है ।जो कभी घाटे में जा ही नहीं सकते, क्योंकि कृषि और किसान में वह क्षमता होती है । किसी भी परिस्थिति में तकनीकी के अभाव में भी श्रम और साहस के द्वारा उत्पादन कर लेते हैं। आप एक जमीन से जुड़े हुए नेता थे जिनमें नेतृत्व की अनन्य संभावनाएं थी । निष्पक्षता, निडरता, मौलिकता एवं व्यापक जनहित़ों को समर्पित ऐसा जीवन था जिसे भारत के प्रसिद्ध विचारक डॉ राम मनोहर लोहिया आदि प्रशंसक थे। वर्मा जी में मौलिकता की अवधारणा श्रेष्ठतम जो उनका सर्वोत्कृष्ट शस्त्र था ।वह जब सभाओं में बोला करते थे आम जनमानस को ऐसा प्रतीत होता था कि ऐसे विचारों की उत्कृष्टता किसी- किसी में ही पाई जाती है। राजनीतिक जीवन में आपने भोग विलास और सुविधा युक्त जीवन ना चुनकर फकीरी का जीवन चुना। यह आज भी और आने वाले समय में भी प्रासंगिक और प्रेरणा स्रोत रहेगा। जिस प्रकार से वह बाहर से दिखते थे और आंतरिक तर्क शैली का प्रयोग करते थे । इन सभी तत्वों को आप व्यवहार व जमीनी हकीकत में भी बदल देते थे। छात्र जीवन से राजनीति को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में छात्र जीवन में ही चुन लिया था ।बावजूद इसके कि छात्र राजनीति में उन्होंने कभी हिस्सा नहीं लिया। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा कालपी और पुखरायां में हुई जहां से उन्होंने हाई स्कूल और इंटर की परीक्षाएं उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण की। वर्मा जी सदैव मेधावी छात्र रहे और स्वभाव से अत्यन्त सौम्य, विनम्र, मिलनसार थे पर आत्मस्म्मान और स्वभिमान उनके व्यक्तित्व में कूट-कूट कर भरा हुआ था। उन्होंने 1949 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय हिन्दी में एम0ए0 और इसके बाद आपने समसामयिक परिस्थितियों को देखते हुए कानून की डिग्री भी उच्च श्रेणी से प्राप्त की। केवल इन्हीं परीक्षाओं में आपने योग्यता और कौशल का परिचय नहीं दिया अपितु प्रसिद्ध प्रतिस्पर्धा की परीक्षा सिविल सेवा में भी सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। इस परीक्षा में इतिहास विषय का चयन किया जो इनके अकादमिक विषयों का कभी भाग नहीं रहा। उनका विश्वास था कि सभी मनुष्य समान है इसलिए वह मानवता मात्र में विश्वास करते थे। उनका मानना था कि राजनेता ऐसे हो जिनको जमीनी समझ हो और नीचे झुके हुए मानव को भी समाज के समान श्रेणी में लेकर आएं । उन्होंने क्रन्ति को परिभाषित करते हुए कहा कि -क्रान्ति जीवन के पूर्व निर्धारित मूल्यों का जनहित में पुनिर्धारण करना है । वही सच्ची क्रांति है। उनके मौलिक विचारों की स्पष्टता और समझ की जरूरत समाज को आज भी है। ऐसे विचार को कि सिर्फ मृत्यु होती है, परंतु विचारों की मृत्यु कभी नहीं होती।
