भाजपा अति विश्वास में, कांग्रेस को एंटी इन्कमबेंसी पर भरोसा

खंडवा।

जो राजपथ पर कांटे की भांति चुभते रहे, उन्हें सिर का ताज कैसे बना सकते हैं, खंडवा लोकसभा उपचुनाव में दोनों पार्टियों के लिए यह कांटे नेताओं पर भारी पड़ रहे हैं। कहने को दोनों पार्टियों में ऊपरी तौर पर एकता का प्रदर्शन हो रहा है, किंतु हकीकत में अंदरुनी सतह पर अपने हिसाब से देख लेना की रणनीति पर काम चल रहा है। भाजपा में ज्ञानेश्वर पाटिल स्वाभाविक दावेदार नहीं थे। पूर्व सांसद नंदकुमार ङ्क्षसह चौहान के बेटे हर्षवर्धन सिंह चौहान और उनकी टीम तो इतनी आश्वस्त थी  िउन्होंने मैदानी तैयारी भी पूरी कर ली थी। उनको टिकट ना दिला पाने का मलाल खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तक को है। सीएम ने सारे विधायकों को सिर्फ हर्षवर्धन के नाम पर सहमति के लिए तैयार कर लिया था, ऐसे में लगी थाली उठाना हर्षवर्धन सिंह चौहान के लिए जितना कष्टदायक रहा, उतना ही दुखदायी श्रीमती अर्चना चिटनीस की दावेदारी खारिज करना भी है। श्रीमती चिटनीस पिछले आमचुनाव में भी नंदूभैया और दीदी को बुरहानपुरी जंग पूरे संसदीय क्षेत्र में चर्चित रही है। अब जबकि न हर्षवर्धन सिंह चौहान को टिकट मिला है और न दीदी को तो क्या ये दोनों नेता और इनके समर्थक दिल से ज्ञानेश्वर पाटिल का काम कर पायेंगे? इस बात से भाजपा नेतृत्व चिंतित है। सीधे भोपाल से कार्यकर्ता स्तर पर फोन लगाकर लिया जा रहा है। खंडवा में दमोह का दोहराव न दो जाये, इस पर सभी की निगाहें हैं। इधर, कांग्रेस में दावेदारी में एकमात्र अरुण यादव ही मैदान में थे। अन्य में बुरहानपुर के निर्दलीय ठाकुर सुरेंद्र सिंह शेरा और खरगोन के रवि जोशी ने टिकट जरूर मांगा, किंतु तैयारी दोनों की नहीं थी, ऐसे में टिकट के चौथे दावेदार ठाकुर राजनारायण सिंह को मिल जाना न केवल सबको चकित कर गया, बल्कि अरुण यादव की टीम और उन्हीं के बनाए संगठन के लिए किसी सदमे से कम नहीं था। अरुण यादव के दावेदारी से इंकार के बाद सारे कार्यकर्ता मैदान छोड़ गये। हालांकि, पूर्व सीएम कमलनाथ क्षेत्र के सारे विधायकों और हारे हुए प्रत्याशियों को बुलाकर हर कीमत पर विधानसभा जिताने की गुहार लगा रहे हैं, किंतु फिर भी कांग्रेस का संगठन जजर््र होने के चलते प्रत्याशी अकेले मैदान में है। वैसे भी राजनारायणसिंह पिछले विधानसभा उपचुनाव में यह कह चुके कि कांग्रेस में चुनाव अपने दम पर ही लडऩा पड़ता है। उनकी यह बात आज भी कांग्रेसियों को याद है। मंधाता में राजनारायणिंस की एकला चलो की नीति के चलते उनके बेटे भारी मतों से पराजित हुए थे।

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