दबे कुचले दलितों के लिए संघर्ष किया हरिचांद ठाकुर ने
रुद्रपुर। महावारुणी महोत्सव मतुआ संप्रदाय का प्रमुख पर्व है। 1812 में हरिचंद गुरु चांद मतुआ मिशन के संस्थापक हरिचंद ठाकुर का जन्म इसी दिन पूर्वी बंगाल के ओड़ा कांदी गांव में पंडित जसोमंत के घर हुआ था। ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बाद भी हरिचंद ठाकुर ने जीवन भर दबे कुचले शोषित लोगों के लिए संघर्ष किया इनके सामाजिक और धार्मिक उत्थान के लिए ही इन्होंने मतुआ संप्रदाय की स्थापना की। इनके कार्य से प्रभावित होकर एक अंग्रेज अधिकारी उनके अनुयायी बने। बाद में अंग्रेज अधिकारी ने ब्रिटिश पार्लियामेंट में दलितों पर सवर्णों के अत्याचार का मामला उठाकर उस पर रोक लगाने की मांग की। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने आदेश जारी कर दलितों पर अत्याचार बंद करने उन्हें चंडाल के नाम से पुकारने या लिखने पर पाबंदी लगा दी। हरिचंद ठाकुर ने 1878 में मानव शरीर को त्याग दिया। बाद में उनके पुत्र गुरुचंद ठाकुर इस संप्रदाय के धर्मगुरु बने और उन्होंने 1880 में महावारूणी स्नान की शुरुआत की। दिनेशपुर 1983 में आचार्य गोपाल महाराज ने हरि मंदिर की स्थापना की और तभी से यह महावारुणी स्नान हो रहा है।
